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जाति प्रश्न के समाधान के के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अम्बेडकर भी काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी हैं

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  • Pages:492 pages
  • Edition Year:2023
  • Publisher:Rahul Foundation
  • Language:Hindi
  • ISBN:9788190631082


Book Description

किसी भी सिद्धान्त की एकमात्र प्रासंगिकता सामाजिक व्यवहार का पथ-प्रदर्शन करने में निहित होती है। किसी भी सामाजिक चिन्तक का चिन्तन वैज्ञानिक और इतिहास-सम्मत है या नहीं और वह सामाजिक मुक्ति का यथार्थवादी मार्ग सुझाता है या नहीं – यही सबसे बुनियादी प्रश्न है। क्या अम्बेडकर का चिन्तन जाति-प्रश्न का वैज्ञानिक-ऐतिहासिक विश्लेषण और समाधान प्रस्तुत करता है? क्या अम्बेडकर के चिन्तन में जाति-प्रश्न का कोई अन्तिम समाधान या दलित-मुक्ति की कोई व्यवहार्य, यथार्थवादी परियोजना मौजूद है? अम्बेडकर ने दलित आन्दोलन का जो मार्ग सुझाया था, क्या उसकी वही परिणति और नियति होनी थी, जो हुई? जाति-समस्या के समाधान के लिए उन्होंने अपने अन्तिम दिनों में बौद्ध धर्म की ओर देखा। क्या बौद्ध धर्म इस समस्या का कोई वास्तविक निदान सुझाता है? अम्बेडकर ने जाति-प्रश्न के समाधान के सन्दर्भ में और व्यापक सन्दर्भों में मार्क्सवाद की जो आलोचना प्रस्तुत की थी, वह कितनी सही थी? मार्क्सवाद का उनका अध्ययन क्या वाक़ई गहन-गम्भीर था? प्रसिद्ध तेलुगु लेखिका रंगनायकम्मा की यह पुस्तक स्पष्ट और बेलागलपेट शैली में, अम्बेडकर, मार्क्स और बौद्ध साहित्य के गहन अध्ययन के आधार पर वस्तुपरक ढंग से, तथ्यों, साक्ष्यों एव तर्कों के साथ इन प्रश्नों से जूझती है और इनके उत्तर ढूँढ़ती है। 




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Ranganaykamma

प्रसिद्ध तेलुगु लेखिका

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